हनुमान बेनीवाल के बारे में

हनुमान बेनीवाल की व्यक्तिगत व राजनैतिक जीवन से जुडी हर जानकारी  हिंदी में पूर्ण विवरण के साथ 

हनुमान बेनीवाल का संक्षिप्त परिचय

  • नाम – श्री हनुमान बेनीवाल
  • पिता – स्व. श्री रामदेव चौधरी
  • माता – श्रीमती मोहनी देवी
  • जन्म दिनांक – 2 मार्च 1972
  • उपनाम: बेनीवाल
  • गोत्र:बेनीवाल
  • शिक्षा – एलएलबी व को-ओपरेटिव में डिप्लोमा राजस्थान विश्वविद्यालय से
  • पत्नी का नाम – श्रीमती कनिका बेनिवाल (बी एस सी , मोहनलाल सुखाडिया विवि उदयपुर)
  • संताने – 1 पुत्री दीया बेनीवाल, 1 पुत्र आशुतोष बेनीवाल
  • ननिहाल – पिण्डेल गौत्री जाट, सिलगांव, मुंडवा
  • ससुराल – श्री कृष्ण जी गोदारा , सरदारपुरा जीवन (श्री गंगानगर)


राजनैतिक विवरण-

  • 1994 में राजस्थान कॉलेज के अध्यक्ष बने
  • 1995 में दुबारा राजस्थान कॉलेज के अध्यक्ष बने
  • 1996 में राजस्थान विधि कॉलेज के अध्यक्ष बने
  • 1997 में राजस्थान विश्वविद्यालय के अध्यक्ष बने
  • 2003 में मुंडवा विधानसभा से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप मे चुनाव लड़ा मगर 2000 वोटों से हार गए|
  • 2008 में बीजेपी के टिकट पर नवगठित खींवसर विधानसभा से चुनाव लड़ा और नागौर जिले की सभी सीटो मे सबसे बड़ी जीत
  • 2013 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप मे खींवसर विधानसभा सीट से अपने निकटतम प्रतिद्वंदी बसपा के दुर्गसिंह चौहान को 24600 वोटों से हराकर दुसरी बार खिंवसर के विधायक बने|
  • 2018 में खींवसर विधानसभा क्षेत्र से राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी से विधायक बने।
  • 2019 लोकसभा चुनावों में नागौर लोकसभा क्षेत्र से 200000 वोटों से कांग्रेस प्रत्याशी ज्योति मिर्धा को हराकर राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी से सांसद चुने गए, यह जीत नागौर लोकसभा क्षेत्र इतिहास की सबसे बड़ी जीत
  • आपके पिता स्व. चौ. रामदेव चौधरी 3 बार मुंडवा (नागौर) विधानसभा से विधायक रहे|
  • मूल निवास- बरणगांव, जिला नागौर
  • वर्तमान निवास- B-7, एमएलए क्वार्टर, जालूपुरा थाने के पास, जयपुर

आज राजस्थान ही नहीं अपितु पुरे देश में आपको किसान कौम के सच्चे साथी, एवं हक के लिये लडने वाले, अन्याय के खिलाफ अपनी दंबग आवाज एवं निडरता से झंडा गाडने वाले से जाना जाता है । आपकी इसी विशेषता के कारण आज आप राजस्थान प्रदेश के युवाओं की पहली पंसद बन चुके हो, एवं आपकी लोकप्रियता दिन-ब-दिन बढती जा रही है ।। आपकी बढती लोकप्रियता से जलकर कुछ समाज कंटको ने गत 23 सितम्बर को आप पर अचानक जानलेवा हमला कर दिया, पर ईशवर की कृपा से सकुशल बच गये । आपकी लोकप्रियता एवं दिल में बसने वाली छवि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आप पर हुऐ हमले के विरोध में समुचे राजस्थान में 200 से अधिक जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुऐ, राजस्थान यूनिवर्सिटी में भी प्रदर्शन हुआ, पुलिस ने निर्दोष युवाओं पर लाठियां बरसाई जिससे 87 युवा घायल हुऐ, आज भी जयपुर के थानों में आपके प्रशंसक बंद है । इसके अलावा भी अनेकों बातें है जिनको लिखते लिखते शायद बरस गुजर जाये 

बचपन में गांव की बैठकी में एक बूढ़े आदमी के मुंह से सुना था, “म्हाने तो गांधी बाबो बचाय लिया”. इसका हिंदी तर्जमा इस तरह से किया जा सकता है कि हमें तो गांधी बाबा ने बचा लिया. स्कूल की किताबों में गांधी जी के बारे में पढ़ा था कि उन्होंने देश को आजादी दिलाई थी, लेकिन उस बूढ़े आदमी की कही गई एक लाइन के सियासी मायने समझने में एक उम्र लग गई.

राजस्थान कई मामलों में देश के दूसरे हिस्सों से अलग है. यू़ं तो इस महादेश का हर हिस्सा एक दूसरे से अलग है, लेकिन राजस्थान और देश के दूसरे हिस्सों के बीच का यह फर्क इस सूबे के सियासी तासीर को समझने का सिरा भी देता है. दरअसल आजादी से पहले राजस्थान में रजवाड़ों का राज हुआ करता था. कहने के लिए “प्रजा मंडल” सूबे में आजादी के आंदोलन का प्रतिनिधित्व कर तो कर रहे थे, लेकिन आंदोलन की लहर उन राज्यों के मुकाबले बहुत फीकी थी जहां अंग्रेजों का सीधा शासन था.

1956 की पहली नवंबर को राजपुताना की 19 रियासतों को जोड़कर ” राजस्थान” नाम का नया सूबा बनाया गया. एक झटके में सामंती व्यवस्था में जी रहे समाज पर जम्हूरियत लाद दी गई. नतीजतन हुआ यह कि शुरुआती दौर में कांग्रेस और विपक्ष दोनों ही तरफ से बड़े किसान और पुराने सामंत विधानसभा पहुंचते रहे. 1962 और 1967 के विधानसभा चुनाव में पुराने सामंतों की गोलबंदी पर खड़ी स्वतंत्र पार्टी 176 सीटों वाली विधानसभा में क्रमशः 36 और 48 सीटें हासिल करने में कामयाब रही.

1956 में जागीर प्रथा का खत्म होना और 1969 में प्रीवी पर्स के तौर पर मिलने वाले भत्तों का बंद होना दो ऐसी घटनाऐं थीं जिसने सूबे के सियासी चरित्र को बदलकर रख दिया. राजस्थान को आजादी से पहले राजपूताना कहा जाता था. सामंतशाही के दौर में यहां एक रवायत थी कि गांव के रावळे (गांव के ठाकुर की हवेली) के सामने से लोग जूते हाथ में लेकर निकला करते थे. गैर राजपूत औरतें नाममात्र का गहना पहन सकती थीं. घोड़े पर सवारी का अधिकार भी सिर्फ राजपूतों के पास था. राजपूत इसी डर के आधार पर सदियों शासन करते आए थे. आजादी के बाद यह डर जाता रहा. गांव की चौपाल में बैठा वो बुजुर्ग इस मानसिक गुलामी के खात्मे के लिए गांधी जी को शुक्रिया कह रहा था.

1970 के बाद खेतिहर जातियों ने पुराने सामंतों और बड़े किसानों के वर्चस्व को चुनौती देना शुरू किया. हालांकि नाथूराम मिर्धा, रामदेव मेहरीया, गौरी पूनिया जैसे कद्दावर विधायक जाट बिरादरी से आते थे, लेकिन ये सब नेता एक संपन्न बैकग्राउंड वाले थे. 1970 के बाद राजस्थान की राजनीति में ऐसे नेताओं ने धाक जमानी शुरू की जिनके सियासी सफर की शुरुआत पंचायत से हुई थी.

राजस्थान में एक जगह है “नागौर”. किसी दौर में नागवंश का शासन होने की वज़ह से इस जगह का नाम हुआ करता था, “अहिछत्रपुर”. ‘अहि’ माने सांप और ‘छत्र’ माने फण. आजादी के बाद से ही यह जिला जाट राजनीति का गढ़ रहा है. इस जिले में एक विधानसभा पड़ती है, मुंडवा. 1972 में हुए परिसीमन के चलते बनी इस सीट पर 1977 में पहली बार चुनाव होना था.

आपातकाल के बाद देश में भयंकर इंदिरा विरोधी लहर थी. राजस्थान आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी विरोधी प्रदर्शनों का गढ़ हुआ करता था. एक तरीके से 1977 के चुनाव का नतीज़ा वोट पड़ने से पहले ही साफ हो चुका था. कांग्रेस के कई नेता ऐन मौके पर वफादारियां बदल रहे थे.

जून 1977 में विधानसभा चुनाव के नतीज़े आए. भैरो सिंह शेखावत के नेतृत्व वाली जनता पार्टी 200 में से 152 सीट जीतकर धमाकेदार तरीके से सत्ता में आई. सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी 145 से सिमटकर 41 सीट पर आ गई थी. यह संख्या 40 पर भी सिमट सकती थी अगर बरण गांव के सरपंच ने भी दूसरे कांग्रेसी नेताओं की तरह अपनी वफादारी बदल ली होती. बरण गांव के इस सरपंच का नाम था रामदेव बेनीवाल. कांग्रेस विरोधी लहर में भी मुडंवा विधानसभा से वो जनता पार्टी के राम प्रकाश के खिलाफ 3,836 वोट से चुनाव जीतने में कामयाब रहे.

1977 के चुनाव में बुरी तरह पिटने के बाद कांग्रेस अंदरूनी कलह का शिकार हो गई. नतीज़तन 1978 में कांग्रेस को एक और विभाजन का शिकार होना पड़ा. कर्नाटक से आने वाले डी. देवराज उर्स के नेतृत्व में देवकांत बरुआ, शरद पवार, एके एंटनी, यशवंत राव चव्हाण, बाबू जगजीवन राम जैसे कई कद्दावर नेता कांग्रेस से अलग हो गए. इन लोगों ने अपनी नई पार्टी का नाम रखा, ‘कांग्रेस (उर्स)’. राजस्थान में रामदेव बेनीवाल भी इस बागी धड़े में शामिल हो गए.

1980 में हुए लोकसभा चुनाव में 352 सीटों के साथ इंदिरा की सत्ता में वापसी हुई. सत्ता में लौटने के साथ ही इंदिरा ने एक-एक करके गैर कांग्रेसी राज्य सरकारों को बर्खास्त करना शुरू किया. राजस्थान की भैरो सिंह शेखावत की सरकार भी इसी चपेट में आ गई. 1980 की मई में राजस्थान में नए सिरे से चुनाव हुए. रामदेव बेनीवाल इस चुनाव में कांग्रेस (यू) का दामन थामे रहे और बुरी तरह से खेत रहे. उन्हें कांग्रेस के कद्दावर नेता रामनिवास मिर्धा के बेटे हरेंद्र मिर्धा के हाथों 8,505 वोटों से मात खानी पड़ी. 1985 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने हरेंद्र मिर्धा को इसी सीट से 3,885 वोट से हराकर अपनी पिछली हार का बदला ले लिया.

1990 के चुनाव में मुंड़वा विधानसभा सीट से एक नए सियासी सितारे का उदय होना था. नाम हबीबुर्रहमान. कांग्रेस की टिकट से लड़ रहे इस नौजवान ने दो बार विधायाक रह चुके रामदेव बेनीवाल को पटखनी दे दी. 1993 के विधानसभा चुनाव में हबीब ने एक बार फिर से यही करिश्मा कर दिखाया. रामदेव बेनीवाल का सियासी करियर ढलान पर था.

1844 में जयपुर के सवाई राजा राम सिंह ने अपने सामंतों और प्रशासनिक अधिकारियों के बच्चों को पढ़ाने के लिए महाराजा कॉलेज बनवाया था. उस समय यह कॉलेज कलकत्ता यूनिवर्सिटी से जुड़ा हुआ करता था. आजादी के बाद यह कॉलेज नई-नई खुली राजस्थान यूनिवर्सिटी के अंडर आ गया.

साल 1994. रामदेव बेनीवाल के लगातार दो चुनाव हारने के एक साल बाद एक नौजवान जयपुर के महाराजा कॉलेज के बाहर अपने कुछ साथियों के साथ खड़ा था. उसके साथी हर आते-जाते छात्र को एक पर्चा थमा रहे थे. इस पर्चे पर लिखा था, हनुमान बेनीवाल फॉर प्रेसीडेंट. हनुमान बेनीवाल 1994 में महाराजा कॉलेज से पहली मर्तबा अध्यक्ष बने. यह सियासत में उनका पहला कदम था. 1995 में वो दूसरी दफा महाराजा कॉलेज के अध्यक्ष बने. 1996 में लॉ कॉलेज के अध्यक्ष चुने गए. बतौर छात्रनेता वो तेजी से उभर रहे थे. आने वाले दो साल उनकी जिंदगी को पूरी तरह बदल देने वाले थे. लेकिन उससे पहले 1996 का एक किस्सा.

ये 1996 का साल था. सुबह के तकरीबन साढ़े चार का वक़्त था. जयपुर के सिन्धी कैंप बस स्टैंड पर खड़े कुछ छात्र चाय पीते-पीते अखबार बांच रहे थे. अखबार के उपरी किनारे पर दर्ज तारीख बताती थी कि यह 9 अगस्त का दिन था. पहले पन्ने पर खबर लिखी हुई थी, ‘राजस्थान विश्वविद्यालय में बवाल, छात्रसंघ अध्यक्ष सहित एक दर्जन छात्रनेता गिरफ्तार.’ ये छात्र इस खबर की एक-एक लाइन पढ़ रहे थे और ठहाके लगाकर हंस रहे थे. इन लोगों ने अखबार को तह करके अपने साथ रख लिया और यूनिवर्सिटी की तरफ बढ़ गए.

राजस्थान यूनिवर्सिटी में प्रदेश के हर कोने से छात्र पढ़ने आते हैं. जाति के अलावा यहां जिलावार गोलबंदिया भी बनी होती हैं. 1996 का छात्रसंघ चुनाव नागौर ग्रुप के पक्ष में रहा था. नागौर के नावां से आने वाले महेंद्र चौधरी राजस्थान यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष बने थे और बरणगांव के रहने वाले हनुमान बेनीवाल लॉ कॉलेज के अध्यक्ष चुने गए थे.

जुलाई के अंत में ये लोग छात्रसंघ का चुनाव जीते थे और अगस्त के पहले सप्ताह से विधानसभा का मॉनसून सत्र शुरू हो गया. विपक्ष के कई छात्र संगठनों ने अपनी मांगों को लेकर यूनिवर्सिटी बंद करने का आह्वान कर दिया. राजस्थान यूनिवर्सिटी उस दौर में बंद और हड़तालों के लिए ही जानी जाती थी. ये दोनों नेता इस प्रचार के दम पर चुनाव जीतकर आए थे कि वो बंद और हड़तालों के चलते यूनिवर्सिटी के आम छात्रों की पढ़ाई डिस्टर्ब नहीं होने देंगे. इसलिए ये दोनों नेता यूनिवर्सिटी बंद के खिलाफ थे.

सुबह सवा नौ बजे दोनों पक्ष यूनिवर्सिटी गेट पर आमने-सामने हो गए. दोनों तरफ से तनाव बढ़ता जा रहा था. पुलिस ने छात्रों की भीड़ को हटाने के लिए लाठीचार्ज कर दिया. बदले में गुस्साए छात्रों ने पुलिस पर पत्थर बरसाने चालू कर दिए. करीब तीन घंटे चली इस लाठी-पत्थर की जंग में दोनों तरफ के कई लोग घायल हुए.

प्रदर्शन पर लगाम लगाने के लिए पुलिस ने एक दर्जन से ज्यादा छात्रों को गिरफ्तार कर लिया. इसमें महेंद्र चौधरी और हनुमान बेनीवाल भी शामिल थे. गिरफ्तार किए गए छात्रों को पहले बजाज नगर थाने लेकर जाया गया और वहां से इन्हें केन्द्रीय कारागार भेज दिया गया. कहते हैं कि उस समय इन छात्रनेताओं का ऐसा रौला था कि जेल की बैरक से निकल-निकलकर कई कैदी इन्हें देखने के लिए बाहर आ गए.

देर रात प्रशासन को सूचना मिली कि अपने छात्रसंघ अध्यक्ष और लॉ कॉलेज अध्यक्ष की गिरफ्तारी के खिलाफ प्रदर्शन के लिए यूनिवर्सिटी के तमाम छात्र लामबंद हो रहे हैं. स्थिति किसी भी क्षण नियंत्रण से बाहर हो सकती थी. प्रशासन जानता था कि एक बार अगर छात्र सड़कों पर आ गए तो उन्हें नियंत्रित करना मुश्किल हो जाएगा.

भैरो सिंह शेखावत उस समय राजस्थान के मुख्यमंत्री थे. विधानसभा सत्र के दौरान वो राजधानी में छात्रों का कोई आंदोलन नहीं चाहते थे. स्थिति पर काबू पाने का एक ही जरिया था. गिरफ्तार किए गए छात्रनेताओं को तुरंत रिहा किया जाए. लेकिन इसमें भी एक दिक्कत थी. जेल के कायदे के हिसाब से सूरज डूबने के बाद जेल के दरवाजे नहीं खोले जा सकते थे. स्थिति की गंभीरता को समझते हुए इस नियम को ताक पर रख दिया गया और रात दो बजे के करीब गिरफ्तार किए गए सभी छात्रनेता छोड़ दिए गए. जब तक ये लोग जेल से छूटकर आए शहर के अखबार छप चुके थे. सिन्धी कैंप पर चाय पीते-पीते ये लोग अपनी ही गिरफ्तारी की खबर पढ़ रहे थे.

5 सितंबर 1997. 28 साल की प्रिया खंडेलवाल (बदला हुआ नाम) जयपुर के गोपालपुरा बस स्टैंड पर खड़ी अपने एक दोस्त का इंतजार कर रही थीं. दोपहर के करीब ढाई बज रहे थे. कुछ ही मिनट में उनका दोस्त विजय दहिया अपनी मोटर बाइक पर उन्हें लेने पहुंच गया. वो उसके साथ बैठकर राजस्थान यूनिवर्सिटी के जेसी बॉस हॉस्टल पहुंचीं. शाम साढ़े चार बजे वो पैदल हॉस्टल से बाहर निकलीं. उन्होंने बाहर आकर अपना पर्स टटोला तो पाया कि उसमें एक भी पाई नहीं बची है.

करीब एक किलोमीटर चलने के बाद उन्होंने ऑटो लेने की बजाए पैदल ही पुलिस स्टेशन की तरफ बढ़ना शुरू किया. वहां दर्ज करवाई गई शिकायत के मुताबिक जेसी बॉस हॉस्टल के एक कमरे में ओम बेनीवाल नाम के एक छात्र के राजस्थान पुलिस में चुने जाने की खुशी में पार्टी चल रही थी. लड़के शराब पी रहे थे और वीसीआर पर ब्लू फिल्म देख रहे थे. इन लोगों ने उसे कमरे में बंद कर दिया और विजय दहिया के साथ मिलकर नशे में धुत 9 छात्रों ने उसके साथ बलात्कार किया.

जयपुर में हुए इस बलात्कार के बाद जनता का गुस्सा फूट गया था. एक महीने पहले ही शिवानी जडेजा नाम की एक स्कूल छात्रा पर तेज़ाब फेंका जा चुका था. जुलाई के महीने में स्कूल में पढ़ने वाली शालिनी तंवर को अगवा करके रेप करने की खबर शहर के अखबार में छाई रहीं. दो महीने में महिलाओं पर हमले की तीसरी घटना के बाद शहर का धैर्य जवाब दे गया था. इस मामले से जुड़े आरोपी राजनीतिक घराने से आते थे. यहां तक कि एक पुलिस अधिकारी भी पीड़िता के यौन शोषण का आरोपी था. ऐसे में पुलिस किसी भी आरोपी को हाथ लगाने से बच रही थी. इससे जनता का गुस्सा बढ़ता जा रहा था.

8 सितंबर के रोज 100 के करीब छात्र जयपुर के महाराजा कॉलेज के सामने पीड़िता के पक्ष में धरना दे रहे थे. इन प्रदर्शनकारियों ने रास्ते पर जीप खड़ी करके रास्ता जाम कर रखा था. लड़के बैनर लेकर खड़े थे. पुलिस की तरफ से रास्ता खुलवाने के लिए लाठीचार्ज शुरू हुआ. आक्रोशित छात्रों ने जवाब में पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया. बैनर के डंडे निकालकर कई छात्र पुलिस वालों से भिड़ गए.

मौके पर मौजूद पुलिस इंस्पेक्टर लक्ष्मीनारायण भिंडा ने लालकोठी थाने में कुछ छात्र नेताओं के खिलाफ राजकार्य में बाधा पहुंचाने का मामला दर्ज करवाया. एफआईआर में दर्ज नाम थे, राज कुमार शर्मा, विजय देहडू और हनुमान बेनीवाल. उस समय तक राजस्थान विश्वविद्यालय के चुनाव नहीं हुए थे.

जेसी बॉस हॉस्टल काण्ड के विरोध में किए गए प्रदर्शन के चलते हनुमान बेनीवाल छात्रों के बीच और ज्यादा लोकप्रिय हो गए. 1997 में हुए छात्रसंघ के चुनाव में वो दोनों बड़े छात्र संगठनों एनएसयूआई और एबीवीपी का दामन थामने की बजाए निर्दलीय लड़े और बड़े आराम से चुनाव जीत गए..

राजस्थान यूनिवर्सिटी में देश की दूसरी यूनिवर्सिटी की तरह ही 12वीं क्लास में मिले प्रतिशत के आधार पर एडमिशन होता है. गांव में पढने वाले छात्रों के पास शहरों की तरह बेहतर संसाधन नहीं होते. ऐसे में गांव के स्कूल से पढ़कर आने वाले छात्र मैरिट में मात खा जाते थे. हनुमान बेनीवाल यूनिवर्सिटी चुनाव के दौरान गांव से आने वाले छात्रों के लिए दाखिले के वक़्त 5 फीसदी अतरिक्त अंक की मांग कर रहे थे. चुनाव जीतने के बाद उन्होंने इस मुद्दे पर आंदोलन छेड़ दिया.

राजस्थान विश्वविद्यालय के छात्र और प्रशासन एक बार फिर से आमने-सामने थे. यूनिवर्सिटी छात्रों और पुलिस के बीच जंग का मैदान बनी हुई थी. छात्रों का यह मुद्दा विधानसभा में बहस की वजह बन गया. उस समय राजस्थान में भैरो सिंह शेखावत के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार थी. सत्ता पक्ष के 58 विधायकों ने सदन में हनुमान बेनीवाल की गिरफ्तारी की मांग की. नतीजतन उन्हें राजस्थान यूनिवर्सिटी में धरना देते हुए गिरफ्तार कर लिया गया. वो कुल 8 दिन जेल में रहे और बाहर छात्र सरकार के खिलाफ मोर्चा बांधकर बैठे हुए थे. आखिरकार उनकी मांग मान ली गई. 5 फीसदी बोनस अंक मिलने की वजह से अगले सत्र में गांव से आने वाले 8000 छात्रों का एडमिशन संभव हो पाया.

हनुमान बेनीवाल के पिता रामदेव बेनीवाल 1990 और 1993 का विधानसभा चुनाव हार चुके थे. राजस्थान में वो जिस जनता दल का झंडा ढो रहे थे वो 1991 में चंद्रशेखर की सरकार गिरने के बाद कई टुकड़ों में टूट चुकी थी. इस कठिन समय में उनका साथ दिया भैरो सिंह शेखावत ने. वही भैरो सिंह शेखावत जिनके खिलाफ हनुमान बेनीवाल जयपुर में छात्र आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे. रामदेव बेनीवाल और शेखावत का परिचय जनता पार्टी के समय से था. शेखावत के कहने पर रामदेव बीजेपी में आ गए.

1998 का विधानसभा चुनाव उनकी सियासत की अग्नि परीक्षा की तरह था. इस चुनाव में हार का मतलब था उनकी सियासी पारी का अंत. रामदेव इस सीट से बीजेपी के प्रत्याशी के तौर पर नामांकन भर चुके थे. 8 दिसंबर 1998 के रोज सूबे में चुनाव होने थे. चुनाव के लिए जनसंपर्क अभियान जोर-शोर से जारी था. 12 नवंबर को अचानक खबर आई कि दिल का दौरा पड़ने की वजह से रामदेव बेनीवाल का इंतकाल हो गया है. यह परिवार और पार्टी दोनों के लिए अप्रत्याशित था.

पार्टी के आला लीडर बेनीवाल के घर मातमपुर्सी के लिए पहुंचे. वहां तय हुआ कि रामदेव बेनीवाल की सियासी विरासत को हनुमान आगे लेकर जाएंगे. जरूरी क्रिया-कर्म से फुर्सत पाकर हनुमान अपने नामांकन के लिए निर्वाचन अधिकारी के पास पहुंचे. वहां जाकर उन्हें पता लगा कि उम्मीदवार के देहांत होने की स्थिति में हर राजनीतिक दल को सात दिन के भीतर-भीतर चुनाव आयोग को सूचना यह भेजनी होती है कि अब उसका नया उम्मीदवार कौन होगा. भारतीय जनता पार्टी की तरफ से यह सूचना भेजने में देर हो गई थी. ऐसे में उनका नामांकन नहीं हो सकता. पिता की मौत के बाद उनकी सियासी विरासत का छिनना उनके लिए दूसरा बड़ा धक्का था. यह कठिनाई और संघर्ष के दौर की शुरुआत थी, जिसे एक दशक लंबा चलना था.

हनुमान बेनीवाल मूलतः नागौर के बरणगांव के रहने वाले हैं. 1959 से इस गांव में सरपंचई उनके परिवार के पास रही है. बरणगांव में एक परंपरा है कि धुलंडी के दिन गांव के सभी लोग ठाकुर जी के मंदिर पर इकठ्ठा होते हैं. अगर गांव में किसी का झगड़ा चल रहा है तो उसे इसी दिन जाजम पर बैठकर सुलझा लिया जाता है. 10 मार्च 2001 के रोज लोग इसी रवायत के चलते ठाकुर जी मंदिर पर इकठ्ठा हुए थे.

गांव को सांसद कोटे से एक सामुदायिक भवन मिला हुआ था. सामुदायिक भवन बनवाने के लिए जमीन की दरकार थी. गांव में जमीन खाली नहीं होने की वजह से ठाकुर जी के मंदिर में खाली पड़ी जमीन पर निर्माण कार्य करवाने की बात तय हुई. सामुदायिक भवन के लिए चिंहित जमीन जल्द ही विवाद का कारण बन गई. गांव के ही परमाराम का कहना था कि प्रस्तावित सामुदायिक भवन का एक हिस्सा उनकी जमीन पर खड़ा होना था. सामुदायिक भवन के लिए जमीन देने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है.

इस विवाद को सुलझाने के लिए परमाराम को भी इस सभा में बुलाया गया. बात सुलझने की बजाए उलझती चली गई. बातचीत की जगह हाथापाई ने ली. इसी गहमागहमी में बंदूक निकल गई. हाथापाई के दौरान जमीन पर गिरे परमाराम के कंधे पर पॉइंट ब्लेंक रेंज से गोली मार दी गई. उन्होंने मौका-ए-वारदात पर ही दम तोड़ दिया.

इस मामले में लिखी गई एफआईआर में गांव के सरपंच प्रहलाद बेनीवाल, उनके भाई हनुमान और नारायण बेनीवाल का नाम शामिल था. प्रहलाद को उसी दिन गांव से गिरफ्तार कर लिया गया. हनुमान बेनीवाल घटना के तीसरे दिन पुलिस की गिरफ्त में थे. इस मामले में वो 88 दिन लगातार जेल में रहे.

पहले पिता की मौत, फिर नामांकन रद्द होना और उसके बाद यह कत्ल केस. बेनीवाल परिवार के लगभग सभी मर्द इस केस में जेल के भीतर थे. परेशानी की ऐसी श्रृंखला जो खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी. इस कत्ल केस के फंद में फंसा परिवार किसी तरह बाहर निकलता उससे पहले एक और ट्रेजडी हो गई. हनुमान के बड़े भाई प्रहलाद ने दिल के दौरे की वजह से जेल में ही दम तोड़ दिया. इस घटना ने परिवार को पूरी तरह से तोड़ दिया.

CrPC या Criminal Procedure Code की 169 नंबर की धारा कहती है कि अगर मामले की तफ्तीश कर रहे पुलिस अधिकारी को यह लगता है कि गिरफ्तार किए गए शख्स के ऊपर कोई मामला नहीं बनता है तो वो उसे छोड़ सकता है. इसी CrPC की धारा 167 कहती है कि केस दर्ज किए जाने के 90 दिन के भीतर-भीतर कोर्ट में चार्जशीट फ़ाइल कर दी जानी चाहिए. चार्जशीट फ़ाइल करने के दो दिन पहले हनुमान बेनीवाल को CrPC की धारा 169 के आधार पर रिहा कर दिया गया. हनुमान बेनीवाल का दावा था कि वो घटना के समय मौके पर मौजूद नहीं थे और पुलिस ने अपनी तफ्तीश में इस दावे को दुरुस्त पाया.

1996 में राजस्थान के छोटे से गांव देव डूंगरी से सूचना का अधिकार आंदोलन शुरू हुआ. 2002 में सूबे के मुख्यमंत्री बने अशोक गहलोत ने इस कानून को सूबे में लागू कर दिया. अशोक गहलोत एक साल बाद होने वाले चुनाव में अपने इस कदम को पूरी तरह भुनाना चाहते थे. 2003 के विधानसभा चुनाव से पहले पूरे प्रदेश की दीवारें एक नारे से पुत गईं, “कांग्रेस सरकार ने क्या दिया? सूचना का अधिकार दिया.”

नागौर की दीवारों पर मोटे काले अक्षरों और हरी हाईलाइटिंग में लिखी एक इबारत सत्ताधारी पार्टी के नारे को चुनौती दे रही थी. यह इबारत थी, “चश्मे का निशान होगा, अगला मुख्यमंत्री किसान होगा”. चश्मा यानी ओम प्रकाश चौटाला की पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल का चुनाव चिन्ह. चौटाला के पिता चौधरी देवीलाल का राजस्थान से पुराना नाता रहा है. 1989 के लोकसभा चुनाव में वो राजस्थान की सीकर सीट से चुनाव जीते थे. देवीलाल जाटों के नेता थे और उनकी नजर राजस्थान की जाट पट्टी पर थी. लेकिन वो अपने इस एजेंडे पर आगे नहीं बढ़ पाए थे. उनके बेटे ओम प्रकाश चौटाला ने पिता के एजेंडे पर आगे बढ़ना शुरू किया. उन्होंने 2003 के चुनाव में 50 जाट बाहुल्य सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे. इनमें से चार उम्मीदवार विधानसभा पहुंचने में कामयाब भी रहे थे.

हनुमान बेनीवाल को बीजेपी का टिकट नहीं मिला था. लिहाजा उन्होंने लोकदल का दामन थाम लिया और अपने पिता की परम्परागत मुंडवा सीट पर मैदान में उतर गए. इस चुनाव में मुंडवा में मुकाबला बहुत दिलचस्प था. बीजेपी ने इस सीट से ऊषा पूनिया को मैदान में उतारा था. ऊषा पूनिया पूर्व विधायक गौरी पूनिया की बहू थीं. कांग्रेस की टिकट पर लड़ रहे थे हबीबुर्रहमान. वही हबीबुर्रहमान जिन्होंने 1990 और 93 के चुनाव में हनुमान के पिता रामदेव बेनीवाल को चित्त किया था.

इस त्रिकोणीय संघर्ष में ऊषा पूनिया को मिले 39,027 वोट, हनुमान बेनीवाल को मिले 35,724 वोट और हबीबुर्रहमान को मिले 32,479 वोट. इस तरह हनुमान बेनीवाल यह मुकाबला 3,303 वोट से हार गए.

यूं तो नागौर ने जीडी सोमाणी, मथुरादास माथुर और एसके डे जैसे नेताओं को लोकसभा भेजा है, लेकिन इस सीट की पहचान रही राजस्थान के बड़े जाट राजनीतिक घराने “मिर्धा” की वजह से. 1971 से 1998 तक लगातार यह सीट मिर्धा परिवार के किसी ना किसी सदस्य के पास रही. नागौर विधानसभा सीट का हिसाब-किताब भी कुछ इसी तरह का रहा. 1957 में नाथूराम मिर्धा यहां से विधानसभा पहुंचे, 1962 में रामनिवास मिर्धा. इसके बाद ये दोनों नेता केंद्र की राजनीति में सक्रिय हो गए. नागौर विधानसभा अगर 1980 और 1991 को छोड़ दें तो यह सीट लगातार कांग्रेस के कब्जे में रही और कांग्रेस का टिकट उसे मिलता था जिसे मिर्धा देना चाहते थे.

रामनिवास मिर्धा के बेटे हरेन्द्र मिर्धा 1993 और 1998 में नागौर सीट से विधायक रहे थे. वो 2003 में बीजेपी के गजेंद्र सिंह खींवसर के हाथों चुनाव हार गए. हरेंद्र मिर्धा के चुनाव हारने की वजह से उनके परिवार के सियासी रसूक पर काफी बट्टा लगा. इसने नागौर में नए जाट चेहरे को उभरने के लिए खाली जगह दी. हनुमान बेनीवाल इस खाली जगह को भरने में तेजी से लगे हुए थे. इस बीच पास ही तहसील डीडवाना में हुए एक हत्याकांड ने उन्हें जाटों के नेता की तरह उभरने का मौक़ा दे दिया.

जीवन राम गोदारा डीडवाना में उभरते हुए जाट नेता थे. मजबूत कद-काठी वाले गोदारा डीडवाना के किसान छात्रावास के प्रमुख हुआ करते थे. इसके अलावा वो डीडवाना में बजरंग दल का काम-काज भी देखते थे. दबंग छवि वाले जीवन राम गोदारा के नाम डीडवाना में दर्जनभर से ज्यादा केस थे. इसमें से एक केस था मदन सिंह राठौड़ की वीभत्स हत्या का. आरोप था कि उन्होंने डीडवाना बस स्टैंड पर भारतीय सेना में काम करने वाले मदन सिंह राठौड़ को पत्थर से पीट-पीट कर मार डाला था.

आनंदपाल सिंह उस समय अपराध की दुनिया में तेजी से उभर रहा था. उसने मदन सिंह राठौड़ की हत्या का बदला लेने की ठानी. 27 जून 2006 की दोपहर जीवन गोदारा डीडवाना बाजार में अपने घर के नीचे बनी दुकान पाटीदार बूट हाउस में बैठा चाय पी रहा था. आनंदपाल अपने पांच दूसरे साथियों के साथ वहां पहुंचा और उसने एक के बाद एक 13 गोलियां जीवन गोदारा के शरीर में दाग दीं. दो अपराधियों की लड़ाई ने देखते ही देखते जाट बनाम राजपूत का मोड़ ले लिया था. हत्या के कुछ घंटे बाद ही डीडवाना राज्य के दूसरे हिस्सों से कट गया. जीवन राम गोदारा को न्याय दिलाने के नाम पर पूरे आस-पास के जिलों के जाट डीडवाना पहुंचने लगे.

जीवन राम गोदारा उस समय की मुंडवा विधायक ऊषा के पति विजय पूनिया के करीब माना जाता था. ऊषा उस समय वसुंधरा राजे सरकार में मंत्री थीं. इस वजह से विजय पूनिया गोदारा की मौत के बाद खड़े हुए प्रदर्शन से दूर रहे. इसके उलट हनुमान बेनीवाल पूरे समय इस आंदोलन में सक्रिय रहे. इसने उन्हें जाट युवाओं के बीच काफी लोकप्रियता दी. वो तेजी से युवा जाट नेता के तौर पर उभरने लगे.

2008 के परिसीमन के बाद मूंडवा सीट खत्म कर दी गई और खींवसर नाम से नई सीट आस्तित्व में आई. हनुमान बेनीवाल को 2008 के विधानसभा चुनाव में खींवसर से बीजेपी की टिकट मिल गई. कांग्रेस ने उनके सामने डॉ. सहदेव चौधरी को टिकट दी थी. बीएसपी की टिकट से लड़ रहे दुर्ग सिंह चौहान ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया था. इस मुकाबले में सफलता बेनीवाल की झोली में गिरी. इस चुनाव में हनुमान के खाते में गए 58,602 वोट. उनके निकटतम प्रतिद्वंदी रहे दुर्ग सिंह, जिन्हें 34,292 वोट हासिल हुए. कांग्रेस के सहदेव चौधरी महज 17,124 वोट ही हासिल कर पाए. माने लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार बेनीवाल विधायक बन गए थे. अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाने की ओर बढ़ चुके थे. पर आगे अभी बहुत कुछ बाकी है. अंत में इतना ही कहना चाहुंगा आप जैसा नेता आज तक इस प्रदेश में नहीं हुआ, राजस्थान की जनता को आपसे बहुत आस-उम्मीद है, ईशवर आपको सकुशल रखें ।।